Tuesday, 4 April 2017

कौन हैं रोहिंग्‍या मुसलमान और क्‍यों मोदी सरकार उन्‍हें देश से बाहर निकालेगी


केंद्र सरकार उन रोहिंग्‍या मुसलमानों को देश से बाहर निकालने की योजना पर काम कर रही है जो गैर-कानूनी तरीके से देश में दाखिल हुए थे। ये मुसलमान म्‍यांमार से देश में आए थे और अब जम्‍मू कश्‍मीर के अलग-अलग हिस्‍सों में गैर-कानूनी तरीके से रह रहे हैं। सरकार अब उस योजना पर काम कर रही है जिसके तहत इन रोहिंग्‍या मुसलमानों को गिरफ्तार करके उन्‍हें फारॅनर्स एक्‍ट के तहत म्‍यांमार प्रत्‍यर्पित किया जाए।
भारत में हैं करीब 40,000 रोहिंग्‍या मुसलमान
इंग्लिश डेली टाइम्‍स ऑफ इंडिया की ओर से दी गई खबर के मुताबिक इस योजना में देश में रह रहे रोहिंग्‍या मुसलमानों को हिरासत में लेना, उनकी गिरफ्तारी और फिर उनका प्रर्त्‍यपण शामिल है।
गृह मंत्रालय के मुताबिक देश के अलग-अलग हिस्‍सों में करीब 40,000 रोहिंग्‍या मुसलमानों ने शरण ले रखी है जिसमें से जम्‍मू में ही अकेले 5,500 से 5,700 रोहिंग्‍या मुसलमान हैं और यह संख्‍या 11,000 तक हो सकती है। जम्‍मू कश्‍मीर की मुख्‍यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने 20 जनवरी को जम्‍मू कश्‍मीर विधानसभा में कहा था कि राज्‍य में कुछ मदरसे हैं जो रोहिंग्‍या मुसलमानों से जुड़े हैं। उनका कहना था कि अभी तक किसी भी रोहिंग्‍या मुसलमान को राज्‍य में आतंकवाद से जुड़ी किसी भी घटना में शामिल नहीं पाया गया है लेकिन 38 रोहिंग्‍या मुसलमानों पर अलग-अलग केसों में 17 एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं। इन एफआईआर में गैर-कानूनी तरीके से बॉर्डर क्रॉस करना भी शामिल है। यूनाइटेड नेशंस ह्यूमन राइट्स कमीशन की ओर से कहा गया है कि 14,000 रोहिंग्‍या मुसलमान भारत में शरणार्थी के तौर पर रह रहे हैं। लेकिन भारत की ओर से इस दावे को खारिज कर दिया गया है। भारत उन्‍हें विदेशी मानता है जो गैर-कानूनी तरीके से देश में दाखिल हुए हैं।
कौन हैं रोहिंग्‍या मुसलमान
  • रोहिंग्‍या मुसलमान मूलत: म्‍यांमार के रहने वाले हैं।
  • यहां के पश्चिमी रखाइन इलाके में इनकी आबादी करीब 10 लाख है।
  • कहते हैं कि ये 16वीं सदी से ही रखाइन में बसे हैं।
  • रोहिंग्या मुसलमानों का कोई देश नहीं है और उनके पास किसी देश की नागरिकता नहीं है।
  • वे म्‍यामारं में रहते हैं और म्‍यांमार उन्हें कानूनी बांग्लादेशी प्रवासी मानता है।
  • म्‍यांमार में बौद्ध धर्म के मानने वालों की आबादी कहीं ज्‍यादा है।
  • बौद्ध धर्म के अनुयायियों पर रोहिंग्‍या मुसलमानों को प्रताड़‍ित करने का आरोप लगता रहता है।
  • यूनाइटेड नेशंस इन्‍हें दुनिया की सबसे प्रताड़ित जातीय समूह मानता है।
  • रखाइन प्रांत में बसे इन रोहिंग्‍या लोगों को बौद्ध 'बंगाली' कहकर भगा देते हैं।
  • रोहिंग्‍या मुसलमान बांग्लादेश के चटगांव की बोली बोलते हैं।
  • मलेशिया और थाइलैंड के बॉर्डर के पास रोहिंग्या मुसलमानों की कई सामूहिक कब्रें मिली हैं।
  • म्यांमार से सटे बांग्लादेश के दक्षिणी हिस्से में करीब तीन लाख रोहिंग्या मुसलमान रहते हैं।
  • बांग्लादेश भी सिर्फ कुछ ही रोहिंग्या मुसलमानों को शरणार्थी के तौर पर मान्यता देता है।
  • अब रोहिंग्या मुसलमान भारत, थाईलैंड, मलेशिया और चीन जैसे देशों की ओर भी जा रहे हैं।

ईवीएम का विरोध और ईवीएम पर चुप्पी- पूरी कहानी


मध्यप्रदेश के भिंड ज़िले के अटेर में ईवीएम मशीन के डेमो के दौरान किसी भी बटन को दबाने पर वीवीपैट पर्चा भारतीय जनता पार्टी का निकलने के बाद ज़िले के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को हटा दिया गया है.
चुनाव आयोग ने भी इस मामले की पूरी जानकारी राज्य की निर्वाचन अधिकारी सेलिना सिंह से मांगी थी. इसके बाद ये कार्रवाई हुई है.
सेलिना सिंह ने बीबीसी से बातचीत में कहा है कि मशीनें ठीक से कैलिब्रेट नहीं हुई थीं, इसलिए ऐसा मामला सामने आया. मध्य प्रदेश की दो विधानसभा सीटों पर आगामी नौ अप्रैल को चुनाव होने हैं.
इन सीटों पर उन ईवीएम मशीनों के ज़रिए चुनाव कराया जाएगा जिनमें वीवीपैट लगे हुए होंगे, यानी वो पेपर जिससे वोट डालने वाले को पता चलता है कि उसका वोट किसे गया है.
उधर इस मामले की जांच करने पहुंची चुनाव आयोग की टीम ने भी मशीन में ख़राबी पाई है.
भोपाल में मीडिया के सामने इन अधिकारियों ने ये भी बताया है कि इस मशीन का इस्तेमाल यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान कानपुर में किया गया था.
हालांकि इस विवाद ने एक बार फिर से ईवीएम के इस्तेमाल को लेकर चल रही बहस को हवा दे दी है. उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजे के तुरंत बाद बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने ईवीएम की भूमिका पर सवाल उठाए थे.
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी कहा था कि अगर किसी राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष ने ईवीएम पर सवाल उठाए हैं तो उसकी जांच कराई जानी चाहिए.
पंजाब विधानसभा के नतीजों पर आम आदमी पार्टी ने ईवीएम में गड़बड़ी के आरोप लगाए थे जिन्हें रविवार को चुनाव आयोग ने ख़ारिज कर दिया.

विपक्ष की हताशा या..
हालांकि जब आरोप लगे, तब चुनाव आयोग ने इन मांगों पर ज़्यादा कुछ नहीं कहा था. भारतीय जनता पार्टी ने भी यूपी समेत चार राज्यों में सरकार बनाने के जश्न के बीच इसे विरोधी दलों की हताशा बताया था.
संसद में सरकार की ओर से केंद्रीय क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा, "जब आप चुनाव जीतते हैं तब ईवीएम की मशीन सही होती है और हारने पर आपको लगता है कि मशीन के साथ छेड़छाड़ की गई है."
रविशंकर प्रसाद ने ये भी कहा कि 2006 में चुनाव आयोग ने जब ईवीएम के इस्तेमाल पर सभी पार्टियों की बैठक बुलाई थी, तो किसी ने इसका विरोध नहीं किया था.
वैसे उत्तर प्रदेश की 403 सीटों में केवल 20 सीटों पर वीवीपैट वाली ईवीएम के ज़रिए मतदान हुआ था, बाक़ी जगहों पर उन मशीनों का इस्तेमाल हुआ था, जिसमें ये पता नहीं लग सकता है कि किसने किसको वोट दिया था.

वीवीपैट वाली ईवीएम के इस्तेमाल का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर, 2013 में बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया था.
लेकिन इसकी व्यवस्था करने के लिए चुनाव आयोग को 3000 करोड़ चाहिए और बीते दो साल में चुनाव आयोग ने सरकार से इस फंड की मांग कई बार की है, लेकिन केंद्र सरकार से उसे ये पैसा नहीं मिला है.
मध्यप्रदेश में जिस तरह का मामला सामने आया है, उससे ईवीएम के इस्तेमाल को बंद किए जाने की मांग ज़ोर पकड़ सकती है.
कांग्रेस के प्रवक्ता दिग्विजय सिंह ने कहा, "मेरा तो हमेशा से ईवीएम पर भरोसा नहीं रहा है. जब दुनिया भर के देशों में बैलेट पेपर से चुनाव होते हैं, तो हमारे यहां ईवीएम से चुनाव क्यों हों?"

भाजपा ने 2009 में विरोध किया

भारतीय जनता पार्टी इन दिनों ईवीएम के इस्तेमाल का समर्थन कर रही है, लेकिन वह इसका विरोध करने वाली सबसे पहली राजनीतिक पार्टी थी.
2009 में जब भारतीय जनता पार्टी को चुनावी हार का सामना करना पड़ा, तब पार्टी के नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने सबसे पहले ईवीएम पर सवाल उठाए थे.
इसके बाद पार्टी ने भारतीय और विदेशी विशेषज्ञों, कई गैर सरकारी संगठनों और अपने थिंक टैंक की मदद से ईवीएम मशीन के साथ होने वाली छेड़छाड़ और धोखाधड़ी को लेकर पूरे देश में अभियान चलाया.
इस अभियान के तहत ही 2010 में भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा प्रवक्ता और चुनावी मामलों के विशेषज्ञ जीवीएल नरसिम्हा राव ने एक किताब लिखी- 'डेमोक्रेसी एट रिस्क, कैन वी ट्रस्ट ऑर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन?'

भाजपा नेताओं ने किताब में उठाए सवाल
इस किताब की प्रस्तावना लाल कृष्ण आडवाणी ने लिखी और इसमें आंध्र प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री एन चंद्राबाबू नायडू का संदेश भी प्रकाशित है.
इतना ही नहीं पुस्तक में वोटिंग सिस्टम के एक्सपर्ट स्टैनफ़र्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डेविड डिल ने भी बताया है कि ईवीएम का इस्तेमाल पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है.
भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव ने किताब की शुरुआत में लिखा है- "मशीनों के साथ छेड़छाड़ हो सकती है, भारत में इस्तेमाल होने वाली इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन इसका अपवाद नहीं है. ऐसे कई उदाहरण हैं जब एक उम्मीदवार को दिया वोट दूसरे उम्मीदवार को मिल गया है या फिर उम्मीदवारों को वो मत भी मिले हैं जो कभी डाले ही नहीं गए."

किताब का चौथा अध्याय ऐसे तमाम उदाहरणों से भरा है. लेकिन अब मौजूदा विवाद के बाद इस मुद्दे पर जीवीएल नरसिम्हा राव कोई प्रतिक्रिया देना नहीं चाहते हैं. हालांकि वे ये ज़रूर कहते हैं कि "ईवीएम का विरोध कर रही पार्टियों को चुनाव आयोग ने जवाब दे दिया है."
जीवीएल नरसिम्हाराव ने अपनी किताब में 2010 के ही उस मामले का जिक्र विस्तार से किया है जिसमें हैदराबाद के टेक एक्सपर्ट हरि प्रसाद ने मिशिगन यूनिवर्सिटी के दो रिसर्चरों के साथ मिलकर ईवीएम को हैक करने का दावा किया था.
इस प्रोजेक्ट में शामिल प्रोफेसर जे एलेक्स हाल्डरमैन ने बीबीसी को दिए इंटरव्यू में बताया था कि मोबाइल फ़ोन से संदेश भेजकर वे ईवीएम मशीन के नतीजे को प्रभावित कर सकते हैं.

'होलसेल फ़्रॉड संभव'
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी भी ईवीएम के इस्तेमाल का जोर शोर से विरोध करते रहे हैं. उन्होंने 2009 के चुनावी नतीजे के बाद सार्वजनिक तौर पर ये आरोप लगाया था कि 90 ऐसी सीटों पर कांग्रेस पार्टी ने जीत हासिल की है जो असंभव है. स्वामी के मुताबिक ईवीएम के ज़रिए वोटों का 'होलसेल फ्रॉड' संभव है.

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल कहते हैं, "जिन लोगों ने सबसे ज़्यादा विरोध किया है वो आज चुप हैं. अपनी सुविधा के हिसाब से लोगों ने इसका विरोध किया और अब दूसरों के विरोध को ख़ारिज़ कर रहे हैं."
वैसे भारत में ईवीएम के प्रयोग पर सबसे पहले सवाल दिल्ली हाई कोर्ट में वरिष्ठ वकील प्राण नाथ लेखी (बीजेपी नेता मीनाक्षी लेखी के पिता) ने 2004 में ही उठाया था.

कांग्रेस ने भी उठाया सवाल
2009 के आम चुनावों में जब बीजेपी के नेता ईवीएम पर सवाल उठा रहे थे, ठीक उसी वक्त ओडिशा कांग्रेस के नेता जेबी पटनायक ने भी राज्य विधानसभा में बीजू जनता दल की जीत की वजह ईवीएम को ठहराया था.
2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की जीत के बाद कांग्रेस के नेता और असम के मुख्यमंत्री तरूण गोगोई ने भी ईवीएम पर सवाल उठाए थे और कहा था कि बीजेपी की जीत की वजह ईवीएम है.
ऐसे में ये कहा जा सकता है कि भारत में जब तक पार्टियां चुनाव नहीं हारने लगतीं तब तक उन्हें ईवीएम मशीन से कोई शिकायत नहीं होती.

जब लालू और ममता ने किया विरोध
लेकिन ये कहना भी पूरी तरह सच नहीं है. भारत में ईवीएम का विरोध वो नेता भी कर रहे हैं, या फिर पूर्व में कर चुके हैं, जिन्होंने चुनाव में ज़ोरदार कामयाबी हासिल की है. इसमें राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी शामिल हैं.
ये दोनों नेता ईवीएम के इस्तेमाल पर रोक लगाने की मांग कर चुके हैं. ये अलग बात है कि इन्हें अलग चुनावों में बहुमत भी मिला है.
इन दोनों के अलावा दिल्ली में ज़ोरदार जीत हासिल करने वाली आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल भी इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन के इस्तेमाल को बैन किए जाने की मांग कर रहे हैं.
पहले तो ये कहा जा रहा था वीवीपैट लगाने के बाद ईवीएम मशीन के साथ किसी तरह की गड़बड़ी की आशंका नहीं होगी लेकिन मध्य प्रदेश के मामले के बाद वीवीपैट के साथ भी ईवीएम संदेह के घेरे में आ चुकी है.

संदेह के बाद क्या होगा?
वैसे चुनाव आयोग समय समय पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को आधुनिक बनाने की दिशा में काम करता रहा है. हाल ही में पांच राज्यों में होने वाले चुनाव से ठीक पहले भी चुनाव आयोग ने ईवीएम को आधुनिक बनाने के लिए टेंडर मंगाए थे.
वैसे ये जानना दिलचस्प है कि भारत में 2004 के आम चुनावों से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल पूरे देश में हुआ है और उसके बाद किसी सीट पर कभी भी वोटों की दोबारा गिनती नहीं हुई है.
अगर किसी सूरत में इसकी नौबत आए, तो ये संभव ही नहीं होगा.
ऐसे में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के इस्तेमाल को वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल तर्कसंगत नहीं मानते. उनका कहना है, "मौजूदा समय में भारत का प्रत्येक राजनीतिक दल कभी ना कभी ईवीएम का विरोध कर चुका है. ऐसे में संसद की संयुक्त संसदीय समिति को ईवीएम के इस्तेमाल की जांच करनी चाहिए."
वैसे बैलेट पेपर से चुनाव कराए जाने की स्थिति में भारत की चुनावी प्रक्रिया लंबी भी होगी और खर्च भी बढ़ेगा. लेकिन दुनिया भर के विकसित देशों में बैलेट पेपर से ही चुनाव कराए जाते हैं, उस अमीरका में भी जहां ईवीएम पहली बार बना था.

Wednesday, 22 March 2017

राम मंदिर पर क्यों आसान नहीं है समझौता?

रामजन्म भूमि और बाबरी मस्जिद विवाद को आपसी सहमति से अदालत के बाहर सुलझाने की सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के पीछे कई वजहें हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये धर्म और आस्था से जुड़ा मामला है और संवेदनशील मसलों का हल आपसी बातचीत से हो. लेकिन ये इतना आसान नहीं है.
हिन्दू-मुसलमानों के तर्क
पहली बात है कि ये किसी का व्यक्तिगत मुकदमा नहीं है. इसमें मुसलमानों की तरफ से शिया और सुन्नी सब शामिल हैं और हिन्दुओं की तरफ से भी सब संप्रदाय शामिल हैं. तो इसमें कोई एक व्यक्ति या एक संस्था समझौता नहीं कर सकती.
दूसरी बात ये कि हिन्दुओं की तरफ़ से तर्क ये है कि रामजन्म भूमि को देवत्व प्राप्त है, वहां राम मंदिर हो न हो मूर्ती हो न हो वो जगह ही पूज्य है.
वो जगह हट नहीं सकती.
हालांकि कुछ लोग ये तर्क देते हैं कि कुछ मुस्लिम देशों में निर्माण कार्य के लिए मस्जिदें हटाई गईं हैं और दूसर जगह ले जाई गई हैं.
वहीं हिन्दुस्तान के मुसलमानों का कहना है कि मस्जिद जहां एक बार बन गई तो वो क़यामत तक रहेगी, वो अल्लाह की संपत्ति है, वो किसी को दे नहीं सकते . इसलिए मुस्लिम समुदाय की तरफ से ये कहा जा रहा है कि अगर इस मामले में सुप्रीम कोर्ट फ़ैसला कर दे तो हमें कोई ऐतराज़ नहीं हैं.
पहले भी हो चुकी हैं समझौते की कोशिशें
इस मामले में समझौते की कई मुश्किलें हैं क्योंकि पहले भी इसकी कोशिशें हुई हैं, दो बार प्रधानमंत्री स्तर पर प्रयास हुए.
इसके अलावा विश्व हिन्दू परिषद और अली मियां जो मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के रहनुमा थे उनके बीच में कोशिश हुई हैं. लेकिन इस मसले में बीच का रास्ते नहीं निकल पाया तो समझौता नहीं हुआ.

अदालत क्यों नहीं कर रही फ़ैसला
अब सवाल ये है कि अदालत इस मसले का फैसला क्यों नहीं कर पा रही है?
दरअसल अदालत के लिए फैसले में सबसे बड़ी दिक्कत है मामले की सुनवाई करना. सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या कम है. ये संभव नहीं है हाई कोर्ट की तरह तीन जजों की एक बेंच सुप्रीम कोर्ट में भी मामले की सुनवाई करे.
हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान कई टन सबूत और काग़ज़ात पेश हुए. कोई हिन्दी में है, कोई उर्दू में है कोई फ़ारसी में है. इन काग़जों को सुप्रीम कोर्ट में पेश करने के लिए ज़रूरी है कि इनका अंग्रेज़ी में अनुवाद किया जाए. अभी तक सारे काग़ज़ात ही सुप्रीम कोर्ट में पेश नहीं हो पाए हैं और सबका अनुवाद का काम पूरा नहीं हुआ है.

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में दूसरी समस्या ये भी है कि मुकदमें के पक्षकार बहुत हैं. ऐसे में सुनवाई में कई हफ़्तों का समय लगेगा.
अगर रोज़ाना सुनवाई करें तो कई बार जज रिटायर हो जाते हैं और नए जज आ जाते हैं. तो सुनवाई पूरी नहीं हो पाएगी. इसीलिए चीफ जस्टिस ने कोर्ट ने बाहर समझौता करने की सलाह दी है. ये भी हो सकता है कि चीफ जस्टिस के दिमाग़ में ये बात रही हो कि अगर कोर्ट कोई फ़ैसला कर भी दे तो समाज शायद उसे आसानी से स्वीकार ना करे.
राम जन्मभूमि का मामला पहले एक स्थानीय विवाद था और स्थानीय अदालत में मुक़दमा चल रहा था. लेकिन जब विश्व हिन्दू परिषद इसमें कूदी तो उसके बाद बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन हुआ और ये विश्व हिन्दू परिषद , भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक हिन्दू राष्ट्र के सपने का हिस्सा हो गया.
ऐसे में मुस्लमानों को ये भी लगता है कि ये एक मस्जिद का मसला नहीं है, अगर हम सरेंडर कर दें तो कहीं ऐसा ना हो कि इसके आड़ में उनके धर्म और संस्कृति को ख़तरा हो जाए.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

आइए जानते हैं अयोध्या विवाद-कब-कब क्या-क्या हुआ

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1528: अयोध्या में मस्जिद का निर्माण। माना जाता है कि मुग़ल सम्राट बाबर ने यह मस्जिद बनवाई थी। इस कारण इसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था।
हिन्दू उस स्थल को अपने आराध्य भगवान राम का जन्मस्थान मानते हैं और वहां राम मंदिर बनाना चाहते हैं।

1853: पहली बार इस स्थल के पास सांप्रदायिक दंगे हुए।

1859: ब्रितानी शासकों ने विवादित स्थल पर बाड़ लगा दी और परिसर के भीतरी हिस्से में मुसलमानों को और बाहरी हिस्से में हिन्दुओं को प्रार्थना करने की अनुमति दे दी।

1949: भगवान राम की मूर्तियां मस्जिद में पाई गयीं। कथित रूप से कुछ हिन्दुओं ने ये मूर्तियां वहां रखवाई थीं। मुसलमानों ने इस पर विरोध व्यक्त किया और दोनों पक्षों ने अदालत में मुकदमा दायर कर दिया। सरकार ने इस स्थल को विवादित घोषित करके ताला लगा दिया।

1984: कुछ हिन्दुओं ने विश्व हिन्दू परिषद के नेतृत्व में भगवान राम के जन्मस्थल को मुक्त करने और वहाँ राम मंदिर का निर्माण करने के लिए एक समिति का गठन किया। बाद में इस अभियान का नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी ने संभाल लिया।

1986: फैजाबाद के ज़िला मजिस्ट्रेट ने हिन्दुओं को प्रार्थना करने के लिए विवादित मस्जिद के दरवाज़े पर से ताला खोलने का आदेश दिया। मुसलमानों ने इसके विरोध में बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति का गठन किया।

1989: विश्व हिन्दू परिषद ने राम मंदिर निर्माण के लिए अभियान तेज़ किया और विवादित स्थल के नज़दीक राम मंदिर की नींव रखी।

1990: विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ताओं ने बाबरी मस्जिद को कुछ नुक़सान पहुँचाया। तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने वार्ता के ज़रिए विवाद सुलझाने के प्रयास किए मगर अगले वर्ष वार्ताएं विफल हो गईं।

1992: विश्व हिन्दू परिषद, शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने 6 दिसम्बर को बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया. इसके परिणामस्वरूप देश भर में हिन्दू और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे जिसमें 2000 से ज़्यादा लोग मारे गए.

1998: अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने गठबंधन सरकार बनाई।

2001: बाबरी विध्वंस की बरसी पर तनाव बढ़ गया और विश्व हिन्दू परिषद ने विवादित स्थल पर राम मंदिर निर्माण करने का अपना संकल्प दोहराया।

जनवरी 2002: अयोध्या विवाद सुलझाने के लिए प्रधानमंत्री वाजपेयी ने अयोध्या समिति का गठन किया। वरिष्ठ अधिकारी शत्रुघ्न सिंह को हिन्दू और मुसलमान नेताओं के साथ बातचीत के लिए नियुक्त किया गया।

फ़रवरी 2002: भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए अपने घोषणापत्र में राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को शामिल करने से इनकार कर दिया। विश्व हिन्दू परिषद ने 15 मार्च से राम मंदिर निर्माण कार्य शुरू करने की घोषणा कर दी। सैकड़ों हिन्दू कार्यकर्ता अयोध्या में इकठ्ठा हुए. अयोध्या से लौट रहे हिन्दू कार्यकर्ता जिस रेलगाड़ी में यात्रा कर रहे थे, उस पर गोधरा में हुए हमले में 58 कार्यकर्ता मारे गए।

13 मार्च, 2002: सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि अयोध्या में यथास्थिति बरकरार रखी जाएगी और किसी को भी सरकार द्वारा अधग्रिहीत जमीन पर शिलापूजन की अनुमति नहीं होगी। केंद्र सरकार ने कहा कि अदालत के फ़ैसले का पालन किया जाएगा।

15 मार्च, 2002: विश्व हिन्दू परिषद और केंद्र सरकार के बीच इस बात को लेकर समझौता हुआ कि विहिप के नेता सरकार को मंदिर परिसर से बाहर शिलाएं सौंपेंगे। रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत परमहंस रामचंद्र दास और विहिप के कार्यकारी अध्यक्ष अशोक सिंघल के नेतृत्व में लगभग आठ सौ कार्यकर्ताओं ने सरकारी अधिकारी को अखाड़े में शिलाएं सौंपीं।
22 जून, 2002: विश्व हिन्दू परिषद ने मंदिर निर्माण के लिए विवादित भूमि के हस्तांतरण की माँग उठाई।

जनवरी 2003: रेडियो तरंगों के ज़रिए ये पता लगाने की कोशिश की गई कि क्या विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद परिसर के नीचे किसी प्राचीन इमारत के अवशेष दबे हैं, कोई पक्का निष्कर्ष नहीं निकला।
मार्च 2003: केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से विवादित स्थल पर पूजापाठ की अनुमति देने का अनुरोध किया जिसे ठुकरा दिया गया।

अप्रैल 2003: इलाहाबाद हाइकोर्ट के निर्देश पर पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने विवादित स्थल की खुदाई शुरू की, जून महीने तक खुदाई चलने के बाद आई रिपोर्ट में कहा गया है कि उसमें मंदिर से मिलते जुलते अवशेष मिले हैं।

मई 2003: सीबीआई ने 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी सहित आठ लोगों के ख़िलाफ पूरक आरोपपत्र दाखिल किए।

जून 2003: काँची पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती ने मामले को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की और उम्मीद जताई कि जुलाई तक अयोध्या मुद्दे का हल निश्चित रूप से निकाल लिया जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

अगस्त 2003: भाजपा नेता और उप प्रधानमंत्री ने विहिप के इस अनुरोध को ठुकराया कि राम मंदिर बनाने के लिए विशेष विधेयक लाया जाए।

अप्रैल 2004: आडवाणी ने अयोध्या में अस्थायी राममंदिर में पूजा की और कहा कि मंदिर का निर्माण ज़रूर किया जाएगा।
जुलाई 2004: शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने सुझाव दिया कि अयोध्या में विवादित स्थल पर मंगल पांडे के नाम पर कोई राष्ट्रीय स्मारक बना दिया जाए।

जनवरी 2005: लालकृष्ण आडवाणी को अयोध्या में छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस में उनकी कथित भूमिका के मामले में अदालत में तलब किया गया।

जुलाई 2005: पाँच हथियारबंद आतंकियों ने विवादित परिसर पर हमला किया जिसमें पाँचों आतंकियों सहित छह लोग मारे गए, हमलावर बाहरी सुरक्षा घेरे के नज़दीक ही मार डाले गए।

06 जुलाई 2005 : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने के दौरान 'भड़काऊ भाषण' देने के मामले में लालकृष्ण आडवाणी को भी शामिल करने का आदेश दिया. इससे पहले उन्हें बरी कर दिया गया था।

28 जुलाई 2005 : लालकृष्ण आडवाणी 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में गुरुवार को रायबरेली की एक अदालत में पेश हुए. अदालत ने लालकृष्ण आडवाणी के ख़िलाफ़ आरोप तय किए।

04 अगस्त 2005: फ़ैजाबाद की अदालत ने अयोध्या के विवादित परिसर के पास हुए हमले में कथित रूप से शामिल चार लोगों को न्यायिक हिरासत में भेजा।

20 अप्रैल 2006 : कांग्रेस के नेतृत्ववाली यूपीए सरकार ने लिब्रहान आयोग के समक्ष लिखित बयान में आरोप लगाया कि बाबरी मस्जिद को ढहाया जाना सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा था और इसमें भाजपा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, बजरंग दल और शिवसेना की मिलीभगत थी।

जुलाई 2006 : सरकार ने अयोध्या में विवादित स्थल पर बने अस्थाई राम मंदिर की सुरक्षा के लिए बुलेटप्रूफ़ काँच का घेरा बनाए जाने का प्रस्ताव किया। इस प्रस्ताव का मुस्लिम समुदाय ने विरोध किया और कहा कि यह अदालत के उस आदेश के ख़िलाफ़ है जिसमें यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए गए थे।

19 मार्च 2007 : कांग्रेस सांसद राहुल गाँधी ने चुनावी दौरे के बीच कहा कि अगर नेहरू-गाँधी परिवार का कोई सदस्य प्रधानमंत्री होता तो बाबरी मस्जिद न गिरी होती. उनके इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया हुई।

30 जून 2009: बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के मामले की जाँच के लिए गठित लिब्रहान आयोग ने 17 वर्षों के बाद अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंपी।

सात जुलाई, 2009: उत्तर प्रदेश सरकार ने एक हलफ़नामे में स्वीकार किया कि अयोध्या विवाद से जुड़ी 23 महत्वपूर्ण फ़ाइलें सचिवालय से ग़ायब हो गई हैं।

24 नवम्बर, 2009: लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में पेश। आयोग ने अटल बिहारी वाजपेयी और मीडिया को दोषी ठहराया और नरसिंह राव को क्लीन चिट दी।

20 मई, 2010: बाबरी विध्वंस के मामले में लालकृष्ण आडवाणी और अन्य नेताओं के ख़िलाफ़ आपराधिक मुक़दमा चलाने को लेकर दायर पुनरीक्षण याचिका हाईकोर्ट में ख़ारिज।

26 जुलाई, 2010: रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद पर सुनवाई पूरी।

8 सितंबर, 2010: अदालत ने अयोध्या विवाद पर 24 सितंबर को फ़ैसला सुनाने की घोषणा की. 24 सितम्बर 2010 को हाईकोर्ट लखनऊ के तीन जजों की बेंच ने फैसला सुनाया जिसमें मंदिर बनाने के लिए हिन्दुओं को जमीन देने के साथ ही विवादित स्थल का एक तिहाई हिस्सा मुसलमानों को मस्जिद बनाने के लिए दिए जाने की बात कही गयी। मगर यह निर्णय दोनों को स्वीकार नहीं हुआ। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर स्थगनादेश दे दिया। अब इस विवाद की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में लम्बित है।

17 सितंबर, 2010: हाईकोर्ट ने फ़ैसला टालने की अर्जी ख़ारिज की।


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